थारू लोकसंस्कृतिके संरक्षणमे साहित्यके भूमिका

फनि ‘श्याम’ थारू- नेपालमे बसोवास करैवाला विभिन्न जातिमध्ये आदिवासी थारू जाति पूरुव मेचीसे पश्चिम महाकालीतक नेपालके तराई, खोंच, बेसी, दून आर उपत्यकामे करीव २५ जिल्लामे बसोवास करैछे। २०५८ सालके राष्ट्रिय जनगणना अनुसार थारूसवके कूल जनसंख्या लगभग १५,३३,८७९ लाखसे बढता छे, जे नेपालके कूल जनसंख्याके ६.७५ प्रतिशत अर्थात् जनसंख्याके चौथा हिस्सा ओंगटन्या छे।
थारू के छिये?
थारू जातिके उत्पत्ति एवं उद्गम स्थानके सम्बन्धमे विद्वानसवके वीच मतेक्यता नय छे। तथापि विद्वानसवके मतक्या मूलतः चार भागमे बाँड्ल ज्यासाकैछे। प्रथम विचारधारा अन्तर्गत थारू शब्दके व्युत्पत्तिक्या आधार बनैल गेन्या छे, जवकि द्वितीय विचारधारा अन्तर्गत किम्वदन्ती एवं कल्पित बातके सम्मिलित करैल गेन्या छे। तृतीय विचारधारा अन्तर्गत राजवंशसे थारूसवके उत्पत्ति भेल बातके आधार बनैल गेन्या छे। यी वमोजिम थारूसव अपनाके राजपुत तथा शाक्यसे सम्वन्धित मानैछे। चौथा विचारधारामे थारूसवके उत्पत्ति मंगोलसे हेल बातमे जोड देल गेन्या छे। यी मध्ये तेसर हे चौथा विचारधारामे बढता बहस केन्द्रित भेल मिल्छे।

थारू जातिके ऐतिहासिकता
थारू जाति नेपालके आदिवासी छिके तथापि यहाँके ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे यी जातिके चर्चा मल्लकालसे मात्र पैल जैछे। लिक्ष्वीकाल तथा उसे अगाडिके राजनैतिक इतिहास यकरसवके प्रति मौन देख्ल जैछे। तथापि कत्हौ कत्हौ शिलालेख तथा ताम्रपत्रमे यकर बारेमे उल्लेख भेन्या नय छे, से बात नय। नेपाल सम्वत् ७२६ अँकित भादगाउँके शासक जगज्योर्ति मल्लके एक अभिलेखमे थारूसवके भाषा पिछडल बात कहल गेन्या छे। यीसे पूर्व लिक्ष्वीकालीन शिलालेखसवके अध्ययन करलापर समेत थारूसवके उपस्थिति रहल आभाष मिल्छे। ललितपुरके चापागाउँस्थित शिवदेव प्रथमके लि.सं. ५१४ के शिलालेखमे ‘स्थारू द्रङ’ शव्द उल्लेख भेलासे थारू जातिके बसोवास लिक्ष्वीकालमे हीं रहल बात प्रष्ट हैछे।
अंशुवर्माके हाँडीगाउँके दोसर अभिलेख, जयदेव द्वितीयके पाटन तंगाहिटी मोननाथ मन्दिरके शिलालेख, मानदेवके चाँगुनारायणके अभिलेख, बसन्तदेव कुशलीके थानकोटके वि.सं. ४२९ अभिलेख आदिमे प्रयुक्त कुशली, थार, हास्तिमार्ग, भार आदि शब्दसव थारू भाषाके शब्दसे निकटके समानता राख्छे। नेपालके एकिकरण हैसे पहिन्या थारूसव राजा हावीके राजपाठ समेत संचालन करन्या रहै। थारू जाति मध्येके थारू राजा दंगीशरण दाङमे राज्य करलके। दंगीशरण कथामे पाण्डव आर यादवसवके बीचमे दंगीशरणके कारणसे युद्ध भेन्या रहै तथा महाभारतकालीन भीम दंगीशरणक्या मदत करैला, दाङ येन्या रहै से बात उल्लेख छे। यीसे थारू प्रागऐतिहासिक कालसे ही दाङमे आपन प्रभुत्व कायम करन्या रहै देख्ल जैछे।
मकवानपुरके राजा मुकुन्द सेनके बेटीसँगे पृथ्वीनारायण शाहके विहा भेन्या रहै। मगर पृथ्वीनारायण शाहके इच्छाअनुसार तत्काले बेटीके विदाई नय देवेके कारणसे ओकरउपर आक्रमण करीके राज हथियेन्या रहै। कहल जैछे सेन राजासव थारू जातिके हीं छेले। थारू जातिमे विहा पश्चात् तत्काले बेटीके विदाई करैके चलन नय छे, ओह्या चलन अनुसार उ आपन बेटीके विदाई नय करन्या रहै कहल जैछे। राजा धनपालसमेत थारू समुदायके रहै।

थारू लोकसंस्कृतिके परिचय
‘लोक’ शब्दके अर्थ हैछे ‘देखैवाला लोग’ अर्थात् जनसाधारण। ओन्हिये संस्कृति शब्द सम् उपसर्गके पाछु कृति जोडैकेवाद सम्±कृति=संस्कृति शब्द बन्छे। आजकल संस्कृति शब्द अंग्रेजीके कल्चर (ऋगतिगचभ) शब्दके समानार्थी मानल जैछे। कुनु भी देशके संस्कृति दुई पृथक धारा शिष्ट संस्कृति आर लोक संस्कृतिसे प्रवाहित हेते आवीरहल छे। शिष्ट संस्कृतिके श्रोत वेद आर शास्त्रक्या मान्ल जैछे, जबकि लोक संस्कृति लोकसे प्रेरणा प्राप्त करैछे। संस्कृतिविद्सवके मतक्या दृष्टिगत करीके थारू लोक संस्कृतिक्या निम्न पाँच वर्गमे विभाजन करल ज्या साक्छे, जेन : क) लोक विश्वास तथा अन्ध–परम्परा (भूतप्रेत, रोगोपचार, यात्रा/सगुन, अन्य), ख) संस्कार तथा विधि– विधान (जन्म, विवाह, मृत्यु), ग) सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक संस्था (चाडपर्व, भोजन, बस्त्र/गहना/आभूषण, कलाकौशल–घर बनाऐक, भित्तेचित्र, टाटु कला, सामाजिक संस्थासव– बरघर प्रणाली, गादी/चौरासी प्रणाली), घ) धार्मिक तथा आध्यात्मिक मान्यता (लोकधर्म एवं देवीदेवतासव, धामी धमिआइनसव), ङ) लोक साहित्य (भाषा, लोकसाहित्य–लोकगीत, लोकगाथा, लोककथा, लोककहवी, अरझापरझा, फकडा आ पिहानी)। थारू लोकसंस्कृति अत्यन्त समृद्ध आर विशाल छे। यकर हरेक पहलु आपनेमे पूर्ण हे विस्तृत छे। यकर भितर अत्यन्त गुह्यतम, रहस्मय, चित्ताकर्षक, संवेगात्मक, मनोरञ्जनात्मक विशिष्ट पक्षसव सन्निहित पैल जैछे।

थारू संस्कृतिके महत्वपूर्ण पक्षसव
• थारू संस्कृति नेपालसे भारतके उत्तरप्रदेश आर विहारतकके विस्तृत क्षेत्रमे फैलल छे, तथापि यी सभैके लागिन एकेटा साझा लोकसंस्कृति बन्न्या छे।
• लोकसंस्कृतिके विविध पक्षसवक्या समेटेके कारणसे यी विविधतायुक्त छे। सेहे विविधता हीं थारू लोकसंस्कृतिके समृद्धिके परिचायक बन्न्या छे।
• थारू लोकसंस्कृतिके गुह्यतम, रहस्यमय आ नविनतम पक्षसवके उद्घाटन नय हैला साक्न्या छे। यीमे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, ऐतिहासिक आर राजनैतिक यर्थात् अत्यन्त मार्मिक एवं मनोरञ्जनात्मक हिसावसे भेन्या छे।
• थारू संस्कृतिके हरेक पक्ष कलासे युक्त देख्ल जैछे। बोलीचाली, अहिरनपहिरन, घरनिर्माण, सिंगारपटार आदि। जन्मसे मृत्युतकके हरेक ऋतु, मास, समय आर पल अनुसारके लोकगीतके विपुल भण्डार उपलब्ध छे। यीमे ऋतु, विरह भाव, सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक आदि सवे विषयके गीतसव पैल जैछे जे भाव, रस, अलंकारसे युक्त आर संगीतवद्ध देखल जैछे।

लोकसंस्कृतिके संरक्षणमे साहित्यके भूमिका
• थारू लोकसंस्कृतिके गुह्यतम आर विशिष्ट पक्षसवक्या उजागर करैला यकर अध्ययन, अनुसन्धान, लेखन, प्रकाशन आर सम्प्रेषण आवश्यक छे। बृहत् जनसमुदायमे सम्प्रेषणके विविध माध्यम मध्ये डकुमेन्ट्री, फिल्म, रेडियो, पत्रपत्रिका, पुस्तक आदि उपयुक्त एवं सशक्त माध्यम छे। यी माध्यमके प्रयोग करीके थारू लोकसंस्कृतिके संरक्षण, सम्वर्द्धन आर विकासमे साहित्य क्षेत्रके अहम् भूमिका हावे साक्छे।
• थारू लोकसंस्कृति थारू जातियेटाके पहिचान नय बल्कि यी जातीय अस्तित्व जोगावैके साथ गौरव समेत बढाबैके काम करैछे। चौतर्फी रुपमे वाह्य संस्कृतिके अतिक्रमणसेे लोपोन्मुख हावीरहल थारू लोकसंस्कृतिके संरक्षण आवश्यक छे। यकर महत्वपूर्ण हे विशिष्ट पक्षक्या उजागर करेला लेखक कलाकार डटीके लाग्ना जरुरी छे। तेकर लागिन अभिलेखालय वा संग्राहलयके स्थापना करना, संस्कृतिके महत्वपूण पक्षसवके अभिलेखीकरण करना, प्रकाशनमे जोड देना, इलेक्ट्रोनिक माध्यमसव सिडी, भिसिडी आदिमे लिपिवद्ध करना, अन्तरवार्ता, टक्स सो, घटना अध्ययन, डकुमेन्ट्री आर बर्का पर्दाके फिलिमसवके बनावैमे तदारुकता देखाना जरुरी छे।
• कला एवं साहित्यके क्षेत्र विशाल हावैके कारणसे यकर संरक्षण संबर्द्धनमे सामुहिक प्रयास विना असंभव छे। विधानुसार साहित्यकारसवके लेखकीय सीप एवं दक्षताके विकास करना जरुरी छे। यी क्षेत्रमे लाग्ल व्यक्तिसव भी विशिष्टता हासिल करीके अग्रसरता देखाना समयके माग छे।
• थारू कला आर लोकसंस्कृतिमे अमूल्य रत्नसव नुकैल छे, ओकर सार्वजनिककरण हे बजारीकरणके तरफ साहित्य क्षेत्रमे संलग्न अगुवासवके ध्यान जाना जरुरी छे। सामाजिक बिकृति आर विसंगतिके उपर कडा प्रहार आर बन्हिया पक्षके अनुकरणके लागिन उत्प्रेरित करना आवश्यक छे।
• थारू कला सँस्कृतिके सम्बन्धमे नकारात्मक टीकाटिप्पणी हेते आवीरहल छे, ओकर तथ्यपरक ढंगसे खण्डनमण्डन करना भी ओत्न्या जरुरी छे।

उपसंहार
थारू जाति अनकण्टार आर बांझ धर्तीक्या उर्वर एवं खेतीयोग्य बनाबैवाला नेपालके धर्ति–पुत्र छिये। यी भू–भागके लागिन हजारौं बरससे जंगली जनावरसंगे लरते यकर संरक्षण करल्के। यकर उत्पत्तिकबारे विद्वानसवमे मतभिन्नता छे। तथापि ऐतिहासिक आधार आर वैज्ञानिक प्रमाणके आधारमे यी जाति गौतमबुद्धके सन्तान वा शाक्यवंशी देख्ल जैछे आर शारिरीक बनावट हे वैज्ञानिक रक्तपरीक्षणके आधारमे यी जाति मंगोलवंशी प्रमाणित भ्याचुक्न्या छे। यकर लोकसंस्कृति विविधतायुक्त देख्ल जैछे। ओह्या विविधता थारूलोकसंस्कृतिक्या गरिमामय लोकसंस्कृति बनावेमे मदत करन्या छे। कला आर साहित्यके लागिन यी क्षेत्र अत्यन्त उर्वरभूमी मान्ल जैछे। थारू जातिके गौरवमय पहिचान यकरसवके कला आर लोकसंस्कृतिमे ही सन्निहित छे। यीसे थारू साहित्यिक क्षेत्र बहुत बन्हिया आर उन्नत विषयवस्तु पावे सक्छे।
साभारः २१ भदौ, गोरखापत्र

One thought on “थारू लोकसंस्कृतिके संरक्षणमे साहित्यके भूमिका

  1. तपाइको लेख ठिक छ राम्रो लग्यो,l
    हुन् त म नवलपरासी को थारु हो ,मेरो आफ्नै किसिमको थारु भाषा छ l

    मैले धेरै लेखहरु पढे हाम्रो थारुहरुको बिषयमा,तर मलाई लाग्छ सबैलाई बिस्तारै थाहा हुदै गैरहेको छ ,हाम्रो वास्तविकता l
    संसारमा आफ्नो पहिचान या कुनै जति र धर्म को पहिचान आर्थिक उन्नतिले नै दिलाउने गर्छ ,आज हामी जतिएताको वकालत गर्छौ ,जतिएताले मात्र खान पुग्दैन हामीलाई ,आज हजारौ थारु घरधुरीहरु छ जहाँ राम्रो संग २ छाक खान पुगेको छैन, धेरै थारुहरु राम्रो शिक्षा हासिल गर्न सकेको छैन ,यस्तो अवस्थमा मलाई लाग्छ ,तपाईहरुको लेखमा उन्नतिका कुरा होस् ,उन्नति गर्ने बाटोको उदाहरण होस् l हुन् त तपाईहरुलाई थाहा छ हाम्रो नेपालमा सबै ठाउमा internet को पहुच छैन l
    जतिएता जोगाउन पर्छ ,हामी नेपालका हरेक कुनामा बसेका थारुहरुलाई जोड्नु पर्छ, तर हामी भित्र वास्तविक अर्कै छ लेखक ज्यु त्यतातिर धयान पुर्याई दुए गजब हुन्थ्यो l

    धन्यबाद

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